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Abstract

लोकतन्त्र को समाज के निचले तबके तक पहुँचाने के लिए किये गये प्रयासों में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने सम्बन्धी पारित विधान पंचायती राज अधिनियम 1992’ (73वाँ संविधान संशोधन) एक आधारभूत कदम है। अनुच्छेद 40 के तहत् किये गये प्रावधान के अनुरूप पंचायती राज को लागू करने से पहले इसके सफल संचालन हेतु समय-समय पर अनेक अध्ययन दल गठित किये जाते रहे हैं। इस समय देश में 34 लाख से अधिक पंचायती राज व्यवस्था के तहत् चुने गये सदस्य और अध्यक्ष पंचायत प्रतिनिधि सक्रिय हैं। इनमे 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति एवं जनजाति के प्रतिनिधि हैं और विभिन्न वर्गों की करीब 34 प्रतिशत पंचायत में प्रतिनिधित्व कर रही है। पंचायती राज की स्थापना का उद्देश्य न केवल स्थानीय स्तर पर विकास एवं कल्याणकारी कार्यक्रमों में स्थानीय जनता का निर्णय निर्माण प्रक्रिया तथा उसके क्रियान्वयन में सक्रिय सहभागिता प्राप्त करना है, बल्कि सत्ता एवं शक्ति के सामान्य जन तक हस्तान्तरण के माध्यम से कमजोर वर्गों, जिसमें अनुसूचित जाति, जनजाति तथा महिलाएं सम्मिलित है, के सशक्तिकरण की दिशा में प्रयास कर एक शोषण मुक्त समान अवसर वाले समाज की स्थापना करना भी है। डॉ0 शर्मा का मानना है कि पंचायती राज लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला है। लोकतंत्र मूलतः विकेन्द्रीकरण पर आधारित शासन व्यवस्था होती है। लोकतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था में पंचायती राज ही वह माध्यम है जो शासन को समान्य जन के दरवाजे तक लाता है। पंचायती राज व्यवस्था में स्थानीय लोगों की स्थानीय शासन कार्यो में अनवरत रूचि बनी रहती है, क्यों कि वे अपनी स्थानीय समस्याओं का स्थानीय पद्धति से समाधान कर सकते है। यद्यपि पंचायती राज संस्थाएं सीमित मात्रा में ही संसाधन जुटा सकती है, परंतु उन्हें इसकी शक्ति प्रदान करना आवश्यक है ताकि राज्य और केन्द्र सरकार पर उनकी निर्भरता कम हो सके। पंचायती राज व्यवस्था में पंचायत को 29 संविधान-प्रदत्त अधिकार प्रदान करने की व्यवस्था है और इसके पक्ष में माननीय न्यायालय समय-समय पर निर्देश भी जारी करता रहता है।

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